एनएचआई और पीडब्ल्यूडी के बीच पांटून पुल की धनराशि को लेकर फंसा पेंच, जर्जर पुल से जान जोखिम में डालकर गुजर रहे हजारों वाहन
विनोद शुक्ला जरवल रोड (बहराइच)। लखनऊ को तराई के जिलों और पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण ‘संजय सेतु’ (घाघराघाट पुल) इस समय बदहाली के आंसू रो रहा है। पुल की स्थिति इतनी जर्जर हो चुकी है कि इसके जॉइंट्स पूरी तरह उखड़ चुके हैं, लेकिन मरम्मत का कार्य फाइलों और बजट के फेर में अधर में लटका हुआ है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और लोक निर्माण विभाग के बीच पांटून पुल के निर्माण की धनराशि को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है, जिससे इस महत्वपूर्ण मार्ग पर कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।

बजट का गणित: मरम्मत बनाम पांटून पुल
पुल की मरम्मत के लिए तैयार किए गए एस्टीमेट के अनुसार, मुख्य मरम्मत कार्य में लगभग 3 करोड़ रुपये का खर्च आना है। हालांकि, मरम्मत के दौरान यातायात सुचारू रखने के लिए एक वैकल्पिक ‘पांटून पुल’ (पीपा पुल) बनाने की आवश्यकता है, जिसकी अनुमानित लागत करीब 9 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसी 9 करोड़ की भारी-भरकम धनराशि को लेकर NHAI और PWD के बीच मामला अटका हुआ है। जब तक धन आवंटित नहीं होता, तब तक मरम्मत कार्य शुरू करने का औपचारिक आदेश जारी नहीं हो पा रहा है।
मौके पर टीम तैनात, आदेश का इंतजार
पुल की गंभीरता को देखते हुए मरम्मत करने वाली तकनीकी टीम पिछले कई दिनों से मौके पर कैंप किए हुए है। टीम के पास साजो-सामान तैयार है, लेकिन प्रशासनिक हरी झंडी न मिलने के कारण वे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। इंजीनियरों का कहना है कि जैसे ही आदेश मिलेगा, काम युद्धस्तर पर शुरू कर दिया जाएगा।
”अगर बड़े वाहनों के आवागमन को पूरी तरह रोक दिया जाए और केवल छोटे वाहनों को निकलने की अनुमति मिले, तो हम सीमित संसाधनों में भी मरम्मत कार्य शुरू करने की कोशिश कर सकते हैं। फिलहाल हम उच्चाधिकारियों के आदेश का इंतजार कर रहे हैं।” — अनंत मौर्या, इंजीनियर, एनएचआई

सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है यह मार्ग
संजय सेतु केवल एक पुल नहीं, बल्कि बहराइच, श्रावस्ती, गोंडा, बलरामपुर और नेपाल को राजधानी लखनऊ से जोड़ने वाली जीवनरेखा है। प्रतिदिन इस पुल से हजारों छोटे-बड़े वाहन और मालवाहक ट्रक गुजरते हैं। पुल के जॉइंट्स उखड़ने के कारण गाड़ियां हिचकोले खाकर गुजरती हैं, जिससे पुल के स्ट्रक्चर पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
जोखिम में राहगीर
स्थानीय लोगों और राहगीरों का कहना है कि पुल पर चलते समय कंपन महसूस होता है। बावजूद इसके, भारी वाहनों का आवागमन बदस्तूर जारी है। प्रशासन की यह ढिलाई किसी बड़ी त्रासदी को निमंत्रण दे सकती है। अब देखना यह है कि विभाग बजट के इस गतिरोध को कब तक सुलझा पाता है और कब लोगों को इस खतरनाक सफर से निजात मिलती है।